मिट्टी, जल और साँस वही, फिर कैसी पहचान?
क्यों बाँटें खुद को हिस्सों में, जब एक है इंसान।
मंदिर-मस्जिद-गिरजा-गुरु, भाव सभी का एक।
प्रेम बिना हर साधना, लगती सूनी नेक।
ऊँच-नीच का भाव त्याग, मन को करो विशाल।
सागर-सा विस्तार लिए, बहे प्रेम का हाल।
मैं से हम की राह पकड़, यही जीवन कमाल।
जो भूखे को रोटी दे, वही सच्चा भगवान।
जो टूटे दिल को जोड़े, वही सच्चा इंसान।
नाम नहीं, काम बड़ा हो, यही सिखाता ज्ञान।
इंसान को इंसान से जोड़ना, यही सच्ची पहचान।
