रात की ठंडी हवा खिड़की से धीरे-धीरे कमरे में आ रही थी। घड़ी की टिक-टिक के अलावा सब कुछ खामोश था। आरव अपनी पुरानी डायरी खोले बैठा था—वही डायरी जिसमें कभी उसने अपने प्यार की शुरुआत लिखी थी।
मीरा…
उसका नाम लिखते ही जैसे दिल में हल्की-सी कसक उठी।
कभी यही नाम उसके चेहरे पर मुस्कान ले आता था। कॉलेज की लाइब्रेरी में पहली मुलाकात, बारिश में भीगते हुए चाय पीना, और बिना वजह घंटों बातें करना—सब कुछ जैसे किसी फिल्म का खूबसूरत हिस्सा था।
लेकिन हर कहानी का अंत वैसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं।
धीरे-धीरे ज़िंदगी बदलती गई। जिम्मेदारियाँ बढ़ीं, सपने अलग हो गए। आरव शहर में रह गया, और मीरा अपने परिवार के साथ दूसरे शहर चली गई। पहले रोज़ बात होती थी, फिर कभी-कभी… और फिर एक दिन बात होना ही बंद हो गया।
ना कोई झगड़ा हुआ,
ना कोई आख़िरी मुलाकात।
बस रिश्ते की आवाज़ धीरे-धीरे खामोशी में खो गई।
आरव ने डायरी के आख़िरी पन्ने पर लिखा—
"कुछ प्यार खत्म नहीं होते… बस बोलना बंद कर देते हैं।"
उसने डायरी बंद की, खिड़की से बाहर देखा। सड़क पर दूर एक पीली लाइट जल रही थी।
दिल में अब भी मीरा थी…
लेकिन अब वो याद बन चुकी थी।
और यही था उनके प्यार का खामोश अंत।
